home page

दिल टूटने से हो सकती है मौत, जानिये ये सांइटिफिक रिजन

Newz Fast, New Delhi वैज्ञानिक दिल के टूटने की प्रक्रिया को ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम (Broken Heart Syndrome) कहते हैं. किसी तरह का दुख, बुरी घटना, किसी के खोने का डर आपको भावनात्मक तौर पर इतना कमजोर कर देता है.
 | 
heart broken news
जब अप्रत्याशित तौर पर दिल की धड़कनें तेज होती हैं तो उससे शरीर के हॉर्मोनल ग्लैंड्स, ब्लड प्रेशर, दिल में खून का बहाव, दिमाग काम करना बंद करने लगता है. ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम (Broken Heart Syndrome) के मामले काफी तेजी से बढ़ रहे हैं.

जब किसी का दिल टूटता है, तो इसका मतलब क्या होता है? क्या वो कार्टून दिल होता है जिसमें अचानक से दरार पड़ जाती है. या फिर किसी कांच की तरह टुकड़े-टुकड़े हो जाता है. दिल टूटने से आपकी मौत भी हो सकती है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं  है कि उसके टुकड़े आपके शरीर में चुभ कर आपकी जान ले लेते हैं. मौत कैसे होती है... आइए जानते हैं इसके पीछे की वैज्ञानिक वजह.

वैज्ञानिक दिल के टूटने की प्रक्रिया को ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम (Broken Heart Syndrome) कहते हैं. किसी तरह का दुख, बुरी घटना, किसी के खोने का डर आपको भावनात्मक तौर पर इतना कमजोर कर देता है. कि दिल की धड़कनें अप्रत्याशित तौर पर चलने लगती हैं. इसे आर्टियल फाइब्रिलेशन (Atrial Fibrillation - AF) कहते हैं. पिछले दो दशकों में आर्टियल फाइब्रिलेशन के मामले काफी ज्यादा तेजी से बढ़े हैं.

जब अप्रत्याशित तौर पर दिल की धड़कनें तेज होती हैं तो उससे शरीर के हॉर्मोनल ग्लैंड्स, ब्लड प्रेशर, दिल में खून का बहाव, दिमाग काम करना बंद करने लगता है. ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम (Broken Heart Syndrome) के मामले काफी तेजी से बढ़ रहे हैं. जिसकी वजह से दुनिया भर के देशों का सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च भी बढ़ता जा रहा है. जिन लोगों को आर्टियल फाइब्रिलेशन होता है, उन्हें स्ट्रोक का पांच गुना और मौत का दोगुना खतरा रहता है.

break up girls

ऐसी आशंका जताई जा रही है कि साल 2030 तक यूरोप में आर्टियल प्राइब्रिलेशन के 1.40 से 1.70 करोड़ मरीज होंगे. यूरोपीय देशों में हर साल 1.20 से 2.15 लाख AF मरीज बढ़ रहे हैं. अमेरिका में साल 2030 तक AF के मरीजों की संख्या करीब 1.21 करोड़ हो जाएगी. जबकि, साल 2010 में यह सिर्फ 52 लाख थी. हैरानी की बात ये है कि AF के होने की असली वजह अभी तक किसी वैज्ञानिक या डॉक्टर को पता नहीं चल पाई है. हालांकि, इसमें जेनेटिक और पर्यावरणीय वजहें भी शामिल हैं.

आर्टियल फाइब्रिलेशन (Atrial Fibrillation - AF) लगातार आगे बढ़ने वाली बीमारी है. यह कई बार अचानक से तीव्र हो जाता है. या फिर धीमे-धीमे स्थाई तौर पर रह जाता है. ये स्थिति विकसित होने में कई साल लगते हैं. अगर ऐसे में आपको किसी तरह का दुख, दर्द, तनाव होता है, या फिर आप शराब पीते हैं, थकान है, बेचैनी है या कैफीन ज्यादा लेते हैं तो मौत का खतरा रहता है. आप सोच रहे होंगे कि दिल टूटने से मौत की बात छेड़ कर ये कहानी कहां चली गई. लेकिन आर्टियल फाइब्रिलेशन (Atrial Fibrillation - AF) का संबंध दिल टूटने के बाद होने वाली मौत के लिए प्लेटफॉर्म तैयार करना है.

असल में आर्टियल फाइब्रिलेशन (Atrial Fibrillation - AF) और ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम (Broken Heart Syndrome) का सीधा संबंध है. इस बारे में एक रिसर्च जर्नल ओपन हार्ट में प्रकाशित हुआ है. इस स्टडी को आरहस यूनिवर्सिटी के डच वैज्ञानिकों ने पूरा किया था. जिसमें बताया गया था कि अपने पार्टनर को खोना या खोने के डर से आपके शरीर में आर्टियल फाइब्रिलेशन का खतरा बढ़ जाता है. यह खतरा एक से दो साल के अंदर ही विकसित हो जाता है. इसी समय में आपकी मौत हो सकती है. या फिर ज्यादा से ज्यादा एक-दो साल और.

अगर आपके साथी की मौत होती है. आप अपनी सामाजिक इज्जत खोते हैं. किसी वजह से शिक्षा या कोई काम पूरा नहीं कर पाते. किसी मनचाहे काम में विफल होते हैं. इससे आपको दिल संबंधी बीमारियां होने की पूरी आशंका है. डायबिटीज हो सकती है. आरहस यूनिवर्सिटी की स्टडी में ये बात स्पष्ट हो जाती है कि अगर आपके साथी की मौत हो जाती है, तो आपके शरीर में 30 दिन के अंदर AF होने का खतरा रहता है. लेकिन आज के समय में यह रिस्क 41 फीसदी बढ़ गई है.

किसी चाहने वाले की मौत या खोने से दिल टूटने और AF होने का खतरा शुरुआती 8 से 14 दिनों में 90 फीसदी ज्यादा रहता है. आमतौर पर जो लोग दुखी नहीं होते, उन्हें ये खतरा एक साल में होने की आशंका रहती है. इसका ज्यादा खतरा 60 साल से कम उम्र के लोगों के साथ होता है, क्योंकि उनके साथ यह डर कम होता है कि वो किसी को जल्दी खो नहीं सकते. अगर किसी की मौत कम उम्र में होती है तो उसके साथी को ज्यादा दुख होता है. अगर ज्यादा उम्र में किसी की मौत होती है, तो उसके साथी को AF होने का खतरा कम रहता है.

अगर इंसान AF की आशंका के चलते अस्पताल में भर्ती होता है और ठीक उसी समय स्ट्रेस हॉर्मोन्स और ब्लड बायोमार्कर्स की निगरानी की जाए तो मरीज को दिल संबंधी गंभीर दिक्कतों को टाला जा सकता है. ये काम तो इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफी से भी किया जा सकता है. लेकिन क्या आपको पता है कि ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम (Broken Heart Syndrome) की शुरुआत कब हुई. असल में वैज्ञानिकों ने इस शब्द की शुरुआत साल 1990 में जापान में सबसे पहले की थी. इसे स्ट्रेस-इंड्यूस्ड कार्डियोमियोपैथी (Stress-induced cardiomyopathy) या ताकोतसुबो कार्डियोमियोपैथी (Takotsubo cardimyopathy) भी कहते हैं.

ताकोतसुबो कार्डियोमियोपैथी (Takotsubo cardimyopathy) यानी ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम कभी भी हो सकता है. इसकी कोई आशंका या भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. इसके लक्षण हैं- अचानक सीने में दर्द, सांस कम होना, इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम का बिगड़ना...जिसे देखकर लगता है कि दिल का दौरा पड़ा है. लेकिन इसमें दिल के अंदर खून की नलियों में खून का बहाव बंद नहीं होता, धीमा हो जाता है. दुनिया भर