हरियाणा में जमीन मालिकों के लिए बड़ी खबर! खाना काश्त से मालिकाना हक में नाम करने का आदेश

हरियाणा खाना काश्त जमीन रिकॉर्ड सुधार 2026

अंबाला। हरियाणा में जमीन खरीदने के वर्षों बाद भी राजस्व रिकॉर्ड में मालिक के रूप में नाम दर्ज नहीं करा पाए लोगों के लिए जमीन के रिकॉर्ड सुधार से जुड़ी व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण है। खासतौर पर ऐसे मामलों में, जहां खरीदार का नाम जमाबंदी के कॉलम नंबर 4 यानी मालिकाना हक में दर्ज होने के बजाय केवल कॉलम नंबर 5 यानी खाना काश्त में दर्ज रह गया।

हालांकि, इसे 4 अक्टूबर 2026 को लिया गया कोई नया फैसला समझना सही नहीं होगा।

अंबाला मंडल में इस व्यवस्था से जुड़ा आदेश जनवरी 2026 में ही सामने आ चुका था। इसके बाद जुलाई 2026 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एक फैसले में भी धारा 32 के तहत ऐसी प्रविष्टियों को सुधारने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण उल्लेख हुआ।

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इस पूरी व्यवस्था का मकसद राजस्व रिकॉर्ड में वर्षों से चली आ रही उस विसंगति को दूर करना है, जिसमें जमीन की खरीद-बिक्री तो हो चुकी है, लेकिन जमाबंदी में मालिकाना हिस्सेदारी उसके अनुसार दर्ज नहीं हुई।

आखिर खाना काश्त का मामला क्या है?

हरियाणा में संयुक्त जमीनों से जुड़े कई पुराने रिकॉर्ड में ऐसी स्थिति देखने को मिलती है, जहां जमीन के किसी हिस्सेदार ने अपना हिस्सा बेच दिया, लेकिन खरीदार का नाम मालिकाना हक वाले कॉलम में दर्ज नहीं हुआ।

उसका नाम केवल खाना काश्त में चढ़ा दिया गया।

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सरल भाषा में समझें तो जमीन की खरीद से संबंधित दस्तावेज मौजूद होने के बावजूद जमाबंदी में खरीदार की स्थिति मालिकाना हिस्सेदार के रूप में स्पष्ट नहीं हो पाती।

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इसी तरह की विसंगतियों को दूर करने के लिए राजस्व रिकॉर्ड के विशेष पुनरीक्षण और सुधार की व्यवस्था की गई है।

खाना काश्त से मालिकाना हक में कैसे आएगा नाम?

उपलब्ध आदेश और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले में दर्ज प्रक्रिया के अनुसार, पात्र मामलों में खाना काश्त में दर्ज खरीदार की प्रविष्टि को सुधार के लिए लिया जा सकता है।

इसके लिए सुधार का दाखिल-खारिज दर्ज किया जाएगा।

रिकॉर्ड की जांच और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद खरीदार का नाम मालिकाना हक वाले कॉलम में सह-हिस्सेदार के रूप में दर्ज किया जा सकता है।

लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बदलाव अपने-आप नहीं होगा।

सिर्फ कॉलम नंबर 5 में नाम दर्ज होने से कोई व्यक्ति स्वतः मालिक नहीं बन जाएगा।

विधिवत सुनवाई के बाद ही होगा फैसला

राजस्व रिकॉर्ड में सुधार से पहले संबंधित पक्षों को सुनने की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है।

अधिकारियों को उपलब्ध दस्तावेज, पुरानी जमाबंदी, बिक्री से जुड़े रिकॉर्ड, दाखिल-खारिज और जमीन में वास्तविक हिस्सेदारी की जांच करनी होगी।

इसके बाद ही यह तय किया जा सकेगा कि खरीदार का नाम मालिकाना हक वाले कॉलम में दर्ज किया जाना है या नहीं।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर व्यक्ति जिसका नाम खाना काश्त में है, उसका नाम अब सीधे मालिकाना हक में चढ़ जाएगा।

हर मामले का फैसला उसके रिकॉर्ड और कानूनी स्थिति के आधार पर होगा।

खरीदार का नाम चढ़ेगा तो विक्रेता का हिस्सा भी घटेगा

इस व्यवस्था का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा विक्रेता की हिस्सेदारी से जुड़ा है।

अगर किसी खरीदार को मालिकाना हक वाले कॉलम में सह-हिस्सेदार बनाया जाता है तो जितना हिस्सा खरीदार के नाम दर्ज होगा, उतना ही हिस्सा संबंधित विक्रेता की हिस्सेदारी से कम किया जाएगा।

इससे जमाबंदी में कुल हिस्सेदारी का संतुलन बना रहेगा।

यानी एक तरफ खरीदार का मालिकाना हिस्सा बढ़ाकर दूसरी तरफ विक्रेता का पुराना पूरा हिस्सा जस का तस नहीं रखा जा सकता।

हिस्से से ज्यादा जमीन बेच दी तो क्या होगा?

पुराने जमीन रिकॉर्ड में एक और बड़ी समस्या सामने आती रही है।

कई मामलों में किसी हिस्सेदार ने अपने वास्तविक मालिकाना हिस्से से ज्यादा जमीन अलग-अलग लोगों को बेच दी।

ऐसी स्थिति में सभी खरीदारों को पूरी-पूरी जमीन का मालिकाना हक देना संभव नहीं होगा।

उपलब्ध प्रक्रिया में ऐसे मामलों के लिए पहले आओ, पहले पाओ के सिद्धांत का उल्लेख किया गया है।

इसका अर्थ है कि पुराने लेन-देन को क्रम के अनुसार देखा जा सकता है और विक्रेता के पास जितना वास्तविक मालिकाना हिस्सा उपलब्ध था, उसी सीमा तक रिकॉर्ड में सुधार किया जाएगा।

विक्रेता के वास्तविक हिस्से से ज्यादा मालिकाना हक पैदा नहीं किया जा सकेगा।

भविष्य में केवल खाना काश्त में नाम दर्ज करने पर रोक

इस पूरी व्यवस्था का एक उद्देश्य पुरानी गलती को आगे दोहराए जाने से रोकना भी है।

संबंधित अधिसूचना में निर्देश दिया गया है कि भविष्य में जमीन के लेन-देन के बाद दाखिल-खारिज को केवल खाना काश्त में दर्ज या मंजूर न किया जाए।

जहां खरीदार को वास्तविक मालिकाना हिस्सा मिला है, वहां उसकी हिस्सेदारी मालिकाना हक वाले कॉलम में उचित तरीके से दिखाई जानी चाहिए।

इससे आने वाले वर्षों में वही समस्या दोबारा पैदा होने की संभावना कम होगी, जिसके कारण आज बड़ी संख्या में पुराने रिकॉर्ड सुधारने पड़ रहे हैं।

रजिस्ट्री से पहले भी रिकॉर्ड सुधार की पड़ सकती है जरूरत

अगर कोई व्यक्ति जमीन की नई रजिस्ट्री कराना चाहता है और उसके मालिकाना हक का आधार केवल खाना काश्त की पुरानी प्रविष्टि है, तो उसे पहले राजस्व रिकॉर्ड में सुधार कराने की जरूरत पड़ सकती है।

इसलिए जमीन बेचने या दूसरी रजिस्ट्री कराने से पहले नवीनतम जमाबंदी जरूर देखनी चाहिए।

सिर्फ पुराने कब्जे या खाना काश्त में दर्ज नाम के आधार पर खुद को निर्विवाद मालिक मान लेना बाद में कानूनी परेशानी पैदा कर सकता है।

पंचायत और शामलात जमीन पर नहीं मिलेगा सीधा फायदा

इस आदेश को लेकर सबसे ज्यादा सावधानी पंचायत और सामूहिक जमीन के मामलों में रखने की जरूरत है।

अगर जमीन का मालिकाना रिकॉर्ड पंचायत देह, शामलात देह, शामलात पट्टी, जुमला मालकान या मुस्तरका मालकान देह जैसी श्रेणी में दर्ज है, तो केवल खाना काश्त में किसी निजी व्यक्ति का नाम होने से उसे निजी मालिकाना हक नहीं मिल जाएगा।

ऐसी जमीनों पर अलग कानून और नियम लागू हो सकते हैं।

इन मामलों में सक्षम राजस्व अधिकारी, न्यायालय या संबंधित प्राधिकरण के आदेश की जरूरत पड़ सकती है।

इसलिए सामान्य निजी जमीन और शामलात या पंचायत जमीन के मामलों को एक जैसा नहीं समझना चाहिए।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला

6 जुलाई 2026 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सामने चमेली देवी बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य से जुड़ा मामला आया।

इस मामले में याचिकाकर्ता की शिकायत जमीन में हिस्सेदारी और राजस्व रिकॉर्ड से जुड़ी थी।

हाईकोर्ट के फैसले में 17 फरवरी 2026 को गुरुग्राम मंडल की ओर से धारा 32 के तहत जारी अधिसूचना का उल्लेख किया गया।

इसी अधिसूचना में खाना काश्त में दर्ज पात्र खरीदारों की प्रविष्टियों को निर्धारित प्रक्रिया के बाद मालिकाना हक वाले कॉलम में सह-हिस्सेदार के रूप में दर्ज करने की व्यवस्था बताई गई थी।

लेकिन अदालत के फैसले से एक और महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है।

अगर विवाद केवल रिकॉर्ड की गलती का नहीं बल्कि जमीन के वास्तविक मालिकाना हक और हिस्सेदारी का है, तो ऐसे विवाद का समाधान केवल विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया से नहीं होगा।

ऐसे मामले में संबंधित व्यक्ति को कानून के तहत उपलब्ध उचित कानूनी रास्ता अपनाना पड़ सकता है।

अंबाला में जनवरी में सामने आया था आदेश

अंबाला मंडल में भी इसी तरह की व्यवस्था जनवरी 2026 में सामने आई थी।

25 जनवरी को प्रकाशित रिपोर्ट में अंबाला मंडल के आयुक्त संजीव वर्मा द्वारा हरियाणा भू-राजस्व अधिनियम, 1887 की धारा 32 के तहत जमाबंदी के विशेष पुनरीक्षण के आदेश का उल्लेख किया गया था।

इसका उद्देश्य ऐसे पुराने मामलों को ठीक करना था, जिनमें जमीन खरीदने वाले का नाम मालिकाना हक के बजाय केवल खाना काश्त में दर्ज रह गया।

इसलिए अक्टूबर में इस खबर को प्रकाशित करते समय इसे नया आदेश बताने के बजाय जमीन मालिकों के लिए महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सुधार प्रक्रिया के रूप में समझना ज्यादा सही होगा।

2,605 नए पटवारियों को भी मिली जिम्मेदारी

हरियाणा में भूमि रिकॉर्ड को दुरुस्त करने की प्रक्रिया केवल एक आदेश तक सीमित नहीं है।

प्रदेश में 2,605 नवनियुक्त पटवारियों को नियमित पटवार सर्कल देने के साथ कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपे जाने की जानकारी सामने आई है।

इन कार्यों में खाना काश्त की प्रविष्टियों में सुधार, जमीन के रिकॉर्ड को व्यवस्थित करना और स्वामित्व योजना से संबंधित मालिकाना रिकॉर्ड तैयार करने जैसे काम शामिल हैं।

इससे पुराने राजस्व रिकॉर्ड में मौजूद विसंगतियों को तेजी से ठीक करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

तकनीकी रूप से प्रशिक्षित पटवारी भी कर रहे काम

हरियाणा में भूमि रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण और पुराने रिकॉर्ड सुधारने के लिए तकनीकी रूप से प्रशिक्षित पटवारियों की भूमिका भी बढ़ाई गई है।

इनके काम में भूमि रिकॉर्ड को आधार से जोड़ना, लाल डोरा क्षेत्र के नक्शों को अपडेट करना, जमीन की पैमाइश से जुड़े काम और खाना काश्त से संबंधित मामलों का निपटारा शामिल है।

इससे स्पष्ट है कि सरकार जमीन के रिकॉर्ड को केवल कागजी स्तर पर सुधारने के बजाय उन्हें डिजिटल और अधिक स्पष्ट बनाने की दिशा में भी काम कर रही है।

क्या रिकॉर्ड सुधरने के बाद बैंक से लोन मिल जाएगा?

मालिकाना रिकॉर्ड स्पष्ट होने से जमीन के दस्तावेज मजबूत हो सकते हैं और बैंक से जुड़े कामों में सुविधा मिल सकती है।

लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि मालिकाना कॉलम में नाम आते ही बैंक निश्चित रूप से कर्ज दे देगा।

बैंक कर्ज देने से पहले जमीन के दस्तावेज, मूल्य, किसी तरह का बंधक या विवाद, आवेदक की पात्रता और अपनी आंतरिक शर्तों की जांच करता है।

इसलिए रिकॉर्ड सुधार को बैंक कर्ज मिलने की गारंटी नहीं समझना चाहिए।

क्या जमीन बेचना आसान हो जाएगा?

जिन लोगों की जमीन खरीद वास्तविक है और केवल राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टि की विसंगति है, उनके रिकॉर्ड में उचित सुधार होने से भविष्य की खरीद-बिक्री में आसानी हो सकती है।

स्पष्ट मालिकाना रिकॉर्ड होने से खरीदार को यह समझने में मदद मिलती है कि जमीन में वास्तविक हिस्सेदार कौन है।

हालांकि, जमीन बेचने की अनुमति पर अदालत की रोक, बंधक, जमीन की श्रेणी और दूसरे कानूनी प्रतिबंध भी असर डाल सकते हैं।

इसलिए रिकॉर्ड में नाम आने के बाद भी जमीन की कानूनी स्थिति की पूरी जांच जरूरी है।

जमीन मालिकों को अब क्या करना चाहिए?

अगर आपने जमीन खरीदी है और नवीनतम जमाबंदी में आपका नाम केवल खाना काश्त यानी कॉलम नंबर 5 में दिखाई दे रहा है, तो सबसे पहले अपनी जमीन से जुड़े दस्तावेज इकट्ठा करें।

पुरानी और नवीनतम जमाबंदी, रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज और जमीन में विक्रेता की हिस्सेदारी की जानकारी देखें।

इसके बाद संबंधित पटवारी, तहसील या सक्षम राजस्व अधिकारी से पता करें कि आपका मामला विशेष रिकॉर्ड सुधार की प्रक्रिया के तहत आता है या नहीं।

किसी बिचौलिए के केवल इस दावे पर भरोसा न करें कि खाना काश्त में नाम होने से मालिकाना हक अपने-आप मिल जाएगा।

सबसे जरूरी बात

हरियाणा में खाना काश्त की पुरानी प्रविष्टियों को मालिकाना रिकॉर्ड के अनुरूप सुधारने की व्यवस्था उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनकी वास्तविक खरीद होने के बावजूद जमाबंदी में मालिकाना हिस्सेदारी स्पष्ट नहीं है।

लेकिन यह सभी खाना काश्त धारकों को स्वतः मालिक बनाने की योजना नहीं है।

रिकॉर्ड सुधार के लिए जमीन के दस्तावेज, विक्रेता का वास्तविक हिस्सा, पुराने लेन-देन और संबंधित पक्षों की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।

पंचायत, शामलात और दूसरी सामूहिक श्रेणी की जमीनों के मामले इससे अलग रहेंगे।

यही अंतर समझना जमीन मालिकों को गलत दावों और भविष्य के कानूनी विवाद से बचा सकता है।

Mukesh Gusaiana
लेखक परिचय

Mukesh Gusaiana

हिंदी न्यूज़ राइटर एवं डिजिटल कंटेंट क्रिएटर

मुकेश गुसाईना न्यूज़ फ़ास्ट के हिंदी न्यूज़ राइटर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। वह कृषि, मंडी भाव, सरकारी योजनाओं, शिक्षा, रोजगार, बिजनेस, टेक्नोलॉजी,और देश-दुनिया की खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाते हैं।